Covid-19
शुभम गौतम कानपुर के एक Engineering के छात्र ने यह लेख लिखा है शुभम 2nd वर्ष के छात्र हैं। इनका कहना है कि कोरोना वायरस की यह महामारी लाइसेंस राज के उस नुकसान को दर्शाती है जिसकी चर्चा हम कदापि ही कभी करते हैं। अगर हमें सफलतापूर्वक महामारियों से लड़ने की तैयारी करनी है तो नियामक सुधार बेहद ज़रूरी हैं।
अंग्रेजी में एक कहावत है कि नरक का रास्ता अच्छे इरादों के अवांछित परिणामों से भरा हुआ है। एक मायने में यह बात भारत की कोरोनावायरस से लड़ाई में सच साबित होती दिख रही है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) इस बात का कड़ाई से नियंत्रण करता है कि कौन से निजी लैब्स वायरस का परीक्षण करने के लिया अधिकृत हैं और कौन नहीं। हालांकि, इन आईसीएमआर लाइसेंसिंग नियमों का उद्देश्य उपभोक्ताओं को फ्रॉड से बचाना है। परन्तु, इन नियमों का प्रभाव विपरीत ही पड़ा है। आईसीएमआर के इन नियमों ने महामारी के शुरुआती चरण में निजी कंपनियों के टेस्टिंग किट्स को मंजूरी देने में काफ़ी ज़रूरी समय बरबाद किया। इससे हमारी मरीजों के पता लगाने, इलाज करने और उनको क्वारंटाइन करने की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
किसी महामारी के खिलाफ लड़ाई में यह ज़रूरी है कि परीक्षण का बाजार अफ़सरशाही के नियंत्रण से मुक्त हो। आईसीएमआर के नियम इस सोच पर आधारित हैं कि चिकित्सा परीक्षण का बाजार एजेंसी द्वारा निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अभाव में विफल हो जाएगा। आखिरकार, अधिकांश उपभोक्ता चिकित्सा विज्ञान के बारे में कम जानते हैं। उपभोक्ताओं के लिए सही-गलत का भेद करना मुश्किल है। उनको बेवकूफ बनाने की इस संभावना के कारण नकली निजी टेस्टिंग किट्स बाज़ार में आ जाएँगी। ये नकली किट्स असली किट्स की तुलना में ज़्यादा पैसे बनाएंगी, क्योंकि नकली परीक्षणों में पैसे की लागत भी ना के बराबर होगी।कुल मिलाकर हमें यह बताने कि कोशिश है कि सरकारी अफ़सरशाही के बिना बाज़ार में नकली परीक्षणों की बाढ़ आ जाएगी। फिर असली परीक्षणों के अभाव में तर्कसंगत उपभोक्ताओं को परीक्षणों के लिए भुगतान करने का कोई मतलब नहीं होगा। जब परीक्षणों के उपभोक्ता ही नहीं रहेंगे तो परिणामस्वरूप लैब्स किसी भी परीक्षण को बेचेंगी ही नहीं।
अर्थशास्त्र की भाषा में हम ऐसे बाज़ार जो सरकार कि अनुपस्थिति में बैठ जाएँ उनको असममित या विषम सूचना (असिमेट्रिक इन्फॉर्मेशन) वाले बाजार कहते हैं। इसका पहला वर्णन जॉर्ज अकरलोफ ने अपने पेपर “द मार्केट फॉर लेमंस” में किया था।
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